दिल्ली के ढलाव घरों से बाहर होतीं कचरा बीनने वाली महिलाएं

सुबह करीब 8 बजे के आसपास हमारे मोहल्ले में असंगठित क्षेत्र के तहत काम करने वाली महिला मजदूर घर-घर से कूड़ा लेने के लिए आती थी। इनके साथ इनका एक बच्चा, करीब 10-12 साल का, भी साथ में आता था।

मां आवाज लगाती है ‘कूड़ा दे दो’ और बच्चा अपनी मां के साथ-साथ चलता है और घरों से डस्टबिन लाकर अपनी मां को देता है और मां उस डस्टबिन से कूड़ा अपने ठेले में रखे एक बड़े से बैग जिसे भक्कू कहा जाता है और जो सिर्फ कूड़ा भरने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है, उसमें डाल देती हैं।

पिछले काफी समय से वह हर रोज आती थी। अभी पिछले तीन महीने से वह नहीं आई उनकी जगह एक पुरूष कचरा बीनने वाला मजदूर आने लगा। मुझे लगा हो सकता है वह अपने गांव चली गई हो इसलिए नही आ रही है। आज अचानक वो फिर से आई मैंने पूछा, “आ गई तुम गांव से वापस?” उन्होंने बताया कि वह गांव नही गई थी, वह घर पर कबाड़ छांटने का काम कर रही थी।

यह पूछने पर कि उन्होंने फेरी लगाना क्यों छोड़ा, कूड़ा निपटान की प्रक्रिया में घर-घर से कूड़ा लेने को फेरी लगाना कहा जाता है, उन्होंने बताया कि अब वह फेरी लगाने का काम नहीं कर पा रही है क्योकि ढलाव घर पर कूड़े से भरे ठेले को उठा कर सीधे कम्पेक्टर में डालना पड़ता है, और उस कमपेक्टर की ऊंचाई इतनी ज्यादा होती है कि वह उसमें कूड़े का ठेला नहीं पलट सकती, इस वजह से उन्होंने गलियों में फेरी लगाकर कूड़ा इकट्ठा करने का काम करना बंद कर दिया।

जब हम सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की पूरी प्रकिया को देखते हैं, तो हम पाते हैं कूड़ा निपटान की इस पूरी प्रकिया में कचरा बीनने वाली महिला मजदूरों की भागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह महत्ता विकासशील देशो में और भी बढ़ जाती हैं।

ठोस कूड़ा निपटान जिसके तहत घरों, संस्थानों, कार्यलयों और स्कूल आदि से निकलने वाला मिश्रित कचरा आता है। इस मिश्रित कचरे में गीला और और सूखा कूड़ा दोनों तरह का कूड़ा आता है। इस प्रकार के मिश्रित कूड़े को अलग-अलग करके उसमें से रिसाइकिलेबल निकालने का काम मुख्यतः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है।

वर्तमान स्थिति में दिल्ली के 11 जोनों में सभी ढलाव घरों पर कम्पेक्टर लगा दिये गये हैं। ढलाव घरों पर कम्पेक्टर लगाने की प्रकिया पिछले कुछ सालों से चल रही थी पर अभी लगभग दिल्ली के सभी जोनों पर बने ढलाव घरों पर कम्पेक्टर मशीन लगा दी गई है।

कम्पेक्टर एक ऐसी तकनीक है जिसे ढलाव घरों पर फिट कर दिया जाता है, प्रत्येक वार्ड में जहां यह कम्पेक्टर लगाया गया है, उस वार्ड का सारा कूड़ा इस मशीन के अन्दर डाला जाता है और मशीन उस कूड़े को कम्प्रेस करने का काम करती है ताकि ज्यादा से ज्यादा कूड़ा कम्पेक्टर में आ सके।

कम्पेक्टर मशीन

यह मशीन मुख्यत यूरोप के देशो में इस्तेमाल की जाती है और वहीं से प्रभावित होकर यह भारत में लाई गई। विदेशो की कूड़ा निपटान प्रकिया और भारत की कूड़ा निपटान प्रकिया में जमीन आसमान का अन्तर है।

अगर जागरूकता के स्तर पर देखें तो हम देखते हैं कि पश्चिमी देशों में ठोस कूड़ा प्रबंधन के प्रति लोगों की जागरूकता अधिक है, वहां पर प्रत्येक घर में कम से कम तीन डस्टबिन होते हैं जिसमें एक में गीला कूड़ा, दूसरे में सूखा कूड़ा और तीसरे में खतरनाक कूड़े के तहत आने वाला कूड़ा होता है जैसे खराब चाकू, लोहे का टूटा फूटा सामान, कांच, आदि।

भारत में कूड़ा निपटान को लेकर अभी भी लोगों में जागरूकता का अभाव है। लोग सभी प्रकार के कूड़े को एक साथ फेंकते हैं, क्योकि भारत में ठोस कूड़ा मिश्रित रूप में निकलता है और इस मिश्रित कूड़े में ही रिसाइकिलेबल निकलता है, जिससे कचरा बीनने वाले मजदूरो की जीविका चलती है। ढलावघर पर कम्पेक्टर लगने का असर सीधे तौर पर असंगठित क्षेत्र के कचरा बीनने वाले मजदूरों की जीविका पर पड़ा है।

दिल्ली शहर में ढलाव घरों पर कम्पेक्टर लगने से कूड़ा निपटान के काम में लगी महिलायें ढलाव घरों पर काम करने से लगभग बाहर हो गई हैं। क्योंकि पहला कारण, कम्पेक्टर एक ठीकठाक ऊंचाई वाली मशीन है। इस मशीन में कूड़ा डालने के लिए एक ठीकठाक ऊंचाई तक कूड़े के ठेले को लेकर जाना पड़ता है, जोकि एक बेहद मुश्किल काम है।

इस प्रकिया में कई बार ठेला टूट भी जाता है। दूसरा बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है कि ढलाव घर पर जिस समय यह मजदूर कूड़ा डालने जाते हैं, इन्हें ढलावघर पर रिसाइकिलेबल निकालने के लिए सिर्फ 5 मिनट का समय दिया जाता है, इस तय शुदा समय में रिसाइकिलेबल निकाल पाना बिल्कुल भी संभव नहीं है।

अभी तक भी चाहे केन्द्र सरकार हो राज्य सरकार किसी के द्वारा भी कचरा बीनने वाले मजदूरों को कोई ऐसी जगह नहीं दी गई है जहां पर यह अपने द्वारा एकत्रित किये गये कूड़े में से रिसाइकिलेबल निकाल सके और बाकी के कूड़े को ढलाव घरों पर डाला जा सकें।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 में कचरा बीनने वाले मजदूरों के काम को पहचान तो मिली लेकिन यह काम किस तरह करेंगे, इन्हें काम करने के दौरान किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़़ता है, इस संदर्भ में कोई विशेष टिप्पणी नहीं है।

रूल 2016 में एट सोर्स छँटाई का प्रावधान है जो सिर्फ गेटेड सोसाइटी पर लागू होता है, पर वहाँ पर भी रहने वाले लोग इन्हें सोसाइटी में रिसाइकिलेबल निकालने की जगह मुहैया नहीं करवाते हैं, कारण साफ है कि गंदगी हमें हमारी सोसाइटी में नहीं चाहिए।

दूसरी तरफ, अनाधिकृत कालोनियां जिसमें दिल्ली की कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा यहा रहता है, यहां पर एट सोर्स छँटाई का प्रावधान लागू नहीं होता है, कचरा बीनने वाले मजदूरों को फेरी लगाकर रिसाइकिलेबल सबसे ज्यादा इन्हीं कालोनियों में मिलता है।

कचरा बीनने वाले इन मजदूरों के पास कूड़े की छँटाई के लिए जगह नहीं होने के कारण इन्हें सारा कूड़ा ढलाव घर पर लेकर जाना पड़ता है और वहाँ पर भी सिर्फ पाँच मिनट की समय सीमा के अन्दर जितना रिसाइकिलेबल निकाल सकते हैं, यह मजदूर निकालते हैं।

ढलाव घरो पर कूड़ा निपटान की इस पूरी प्रकिया में सबसे ज्यादा शिकार कचरा बीनने वाली महिला मजदूर हुईं। जिस समय यह कम्पेक्टर ढलाव घरों पर नहीं थे उस समय कचरा बीनने वाली असंगठित क्षेत्र की मजदूर ढलाव घरों पर कूड़ा डालती थीं, उस दौरान इनके पास भरपूर समय होता था जिससे कि यह रिसाइकिलेबल निकाल सकती थी एवं अपनी जीविका को सुरक्षित रख सकती थीं।

जब हम इसे देश की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़कर देखते हैं तो हम पाते हैं कि जितना भी कूड़ा उत्पन्न होता है, यदि उसमें से अधिकाशं रिसाइकिलेबल निकाल लिया जाये तो उससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत ही होती है और पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी यह पर्यावरण को सुरक्षित रखने में मदद करता है।

वर्तमान स्थिति में सारा कूड़ा ढलाव घरों पर रखे कम्पेक्टर में जाता है और उसमें बिना रिसाइकिलेबल निकाले उस कूड़े को कम्पेक्टर से निकाल कर वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में भेज दिया जाता है, जहां इससे बिजली बनाई जाती है। बिजली बनाने की प्रकिया में कूड़े से जो गैसें निकलती हैं वह पर्यावरण को नुकसान पहुचाने की एक बड़ा कारण है।

हम कूड़ा तो बेतहाशा उत्पन्न कर रहे हैं परन्तु इस कूड़े का निपटान कैसे होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है। दूसरा, कचरा बीनने वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को कैसे आर्थिक स्तर और सामाजिक स्तर पर समावेशी बना सकें, इसके लिए कोई योजना नहीं है। अन्य सेक्टरों की तरह कूड़ा निपटान के काम में लगी महिलाओं का रोजगार भी इस तरह की नई तकनीकों के कारण प्रभावित हो रहा है जिस पर शायद ही किसी का ध्यान हो।

(बलजीत मेहरा पीएचडी स्कालर,जामिया मिलिया इस्लामिया, हैं।)

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